@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: समाज नियंत्रित अर्थव्यवस्था
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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

विपक्ष में तो अब बस जनता रह गई है, चूसे जाने के लिए

पिछले आलेख पर बड़े भाई ज्ञानदत्त जी की टिप्पणी थी .....
"ज्ञानदत्त G.D. Pandey 1 December, 2009 4:31 PM   मन्दी? कहां है मन्दी? रेल यातायात डील करते समय मुझे मन्दी नहीं दीखती। कितना सीमेण्ट, कोयला, स्टील, उर्वरक ... सब चले जा रहा है अनवरत। और बहुत कुछ जा रहा है पूर्वान्चल/बिहार को! मुझे बताया गया कि ग्रोथ रेट सात परसेण्ट के आस-पास है। विपक्ष जोर लगा कर भी मंहगाई को सफल चुनावी मुद्दा नहीं बना पाया। सो मन्दी तो मिथक है। जिसे हम सब एक्स्प्लेनेशन के लिये पाल रहे हैं"


लेकिन उन लाखों लोगों से पूछें जो मंदी के नाम पर छंटनी के फलस्वरूप बेरोजगार कर दिए गए हैं। उन से पूछें जिन से उन के  माथे पर छंटनी की तलवार लटका कर आठ घंटों के स्थान पर चौदह और सोलह घंटे काम लिया जा रहा है या उन से कम वेतनों पर काम करने की नयी सेवा शर्तें तय करा ली गई हैं। उन विद्यार्थियों से पूछें जिन के कैंपस सेलेक्शन के बाद अभी तक नियुक्तियों का पता नहीं है। जहाँ नियुक्तियाँ हो भी रही हैं वहाँ वेतन लगभग आधे कर दिए गए हैं। एक सोफ्टवेयर इंजिनियर को छह से दस हजार प्रतिमाह की नौकरी के प्रस्ताव मिल रहे हैं। उन के लिए मंदी है। नहीं है तो फिर जनता को झाँसा दे कर लूटा जा रहा है।

ज्ञान जी ने जो उदाहरण दिए हैं वे सब रेलवे से संबद्ध हैं। भारतीय रेलवे आबादी और उस की जरूरतों के मुकाबले बहुत छोटी हो गई है। उस के पास सवारियाँ ढोने को कम गाड़ियाँ हैं। जो हैं उन्हें चलाने के लिए पर्याप्त रेलपथ नहीं हैं। गाड़ियों की सूची इतनी व्यस्त है कि एक जरा सी भी बाधा से कई दिनों तक का मामला खराब हो जाता है। इधर कोटा के आसपास जो थर्मल बिजलीघर हैं उन के बारे में पिछले दिनों खबर थी कि कोयला समय पर नहीं पहुँचा, केवल सात दिनों का स्टॉक रह गया। जो व्यवसाय समाज की आवश्यकता से बहुत न्यून हो जाएगा वहाँ मंदी क्या असर दिखाएगी? लेकिन जिन व्यवसायों में पिछले सालों में मुनाफा बरस रहा था। सारी फालतू पूँजी वहीं समेट दी गई। अतिउत्पादन से वहाँ मंदी आनी ही थी। नतीजा यह हुआ कि बहुत सी इकाइयाँ बैठ गई और उन में लगी पूँजी की कीमत नगण्य हो गई। यही तो मंदी का गणित है।


कुछ क्षेत्रों में तेजी से पूँजी का बहना, उस का संकेन्द्रण और अतिउत्पादन। बाकी सब क्षेत्रों में तो मंदी नहीं दिखाई देगी। वहाँ तो पूँजी का अभाव महंगाई को ही बढ़ाएगा। यही कारण है कि एक ओर मंदी का विशाल दानव दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर महंगाई की दानवी मुहँ बाए खड़ी हो जाती है। आज की अर्थव्यवस्था में जो उत्पादन की अराजकता है। वही तो इन संकटों की जन्मदाता है। एक वर्ष प्याज और टमाटर के भाव आसमान पर होते हैं तो अगले वर्ष उसी की खेती बहुसंख्यक किसान करते हैं और फिर अतिउत्पादन से दोनों सड़ने लगते हैं। लागत न मिलने पर किसान आत्महत्या पर मजबूर हो जाते हैं।
सीमेंट, कोयला, स्टील और उर्वरक ये सब जीवन के लिए आधारभूत वस्तुएं हैं। इन के उत्पादन में मुनाफा कम है और लागत के लिए विशाल पूंजी की आवश्यकता है। इतनी बड़ी पूँजी कौन लगाए? इनमें मंदी का क्या असर हो सकता है? एक बात और, मंदी के बहाने बढ़ाई गई बेरोजगारी, वेतनों में कमी और महंगाई। उपभोक्ताओं की जेब में पहुँचने वाली धनराशि को बड़ी मात्रा में कम करती है और बाजार सिकुड़ता है। यह मंदी के प्रभाव में और तेजी लाती है।


मंदी तो है। मेरा कहना तो यही था कि अर्थव्यवस्था के नियोजन से इस मंदी पर काबू पाया जा सकता है।  किन हम आग लगने पर कुआँ खोदने दौड़ते हैं। पहले से पानी की व्यवस्था नहीं रखते या फिर आग न लगने देने के साधन नहीं करते। क्या हमें वे नहीं करने चाहिए? बड़े भाई ने विपक्षी दलों द्वारा महंगाई के मुद्दे का लाभ न उठा सकने पर निराशा जाहिर की है, पर विपक्षी दल है कहाँ? सब पक्ष में ही खड़े हैं कोई खुल कर खड़ा है तो कोई पर्दे के पीछे। विपक्ष में तो अब बस जनता रह गई है, चूसे जाने के लिए।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

सब बातें छोड़ कर सोचिए पहले खाने के बारे में

आज से राजस्थान में अदालतें सुबह की हो गईं हैं जो 30 जून तक रहेंगी। अब सुबह सात से साढ़े बारह की अदालत है। लेकिन परिवार न्यायालय, श्रम न्यायालय, राजस्व न्यायालय का समय पहले की तरह दस से पाँच बजे तक ही रहेगा। यहाँ यह सुविधा दे दी गई है कि खुले न्यायालय का समय डेढ़ बजे तक रहेगा उस के बाद अदालतें चेम्बर का और कार्यालय का काम निपटाएंगी। हम इस तरह हम अब साढ़े सात बजे घर से निकला करेंगे और तकरीबन दो बजे से तीन बजे के बीच घर वापसी संभव हो सकेगी। शाम को सात से दस, साढ़े दस बजे तक अपना वकालत का दफ्तर करना पड़ेगा। कुछ काम शेष होने पर देर रात तक भी काम करना पड़ सकता है। इस में अपनी चिट्ठाकारी के लिए समय चुराना कितना दुष्कर हो जाएगा आप समझ सकते हैं।

आज सुबह जल्दी पौने पाँच पर ही उठ जाना पड़ा। तैयार होते होते सात बज गए। बीच में समय मिला तो कुछ चिट्ठों पर आलेख पढ़े। लेकिन इन सब पर कमेटिया नहीं पाए, इतना समय नहीं था। सुबह पढे गए चिट्ठे भ्रष्टाचार की पाठशाला, Dr. Chandra Kumar Jain's Home, फुरसतिया, नौ दो ग्यारह, घुघूती बासूती, शब्‍दों का सफ़र, आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म, ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल, हैं। मैं ने सुबह ही इन के नाम नोट कर लिए थे। फिर साढ़े सात अदालत के लिए निकल लिए। आ कर कुछ घरेलू काम निपटाए। फिर थोड़ा विश्राम, और फिर पांच बजे से लग गए अपने काम पर। अभी काम का एक हिस्सा पूरा कर साढ़े दस बजे निपटा हूँ। इस बीच शाम सात बजे भोजन भी किया है।

दिन में अदालत से आ कर भी कुछ चिट्ठे पढ़े सब कुछ सामान्य सा लगा। अभी रात को इंक़लाब: पर "अब पहले खाने के बारे में सोचिए!" पढ़ा। आज का सब से सार्थक आलेख है। जैसा विषय था और जिस गंभीरता के साथ सत्येन्द्र रंजन ने इसे लिखने का श्रम किया है। उसे इस आलेख को पढ़ कर ही जाना जा सकता है। इस आलेख में दुनियाँ भर में गहरा रहे अनाज संकट का उल्लेख है। जिसे पढ़ कर लगा कि सुबह पुराणिक जी जिस आटे के लिए ईएमआई और बैंक लोन की बात कर रहे थे वह मजाक नहीं अपितु एक सचाई हो सकती है आने वाले समय में। इस भोजन की समस्या पर विचार करते समय। उन्हों ने दुनिय़ाँ के विकास की दिशा पर विचार किया और लगा कि दिशा की त्रुटि ही समस्याओं की मूल है। इस के साथ साथ माँसाहार के बढ़ने, किसानों का खाद्य फसलों के स्थान पर औद्योगिक फसलों की ओर झुकाव और उद्योगों व सरकारों द्वारा इस के लिए प्रोत्साहन आदि बिन्दुओं पर चर्चा करते हुए इस नतीजे पर पहुँचा गया है कि तमाम प्रश्नों को ताक पर रख कर दुनियाँ को खाद्य समस्या हल करनी होगी अन्यथा सभ्यता एक बहुत बड़े संकट का सामना करने वाली है जो मानव के समस्त सपनों के लिए कब्रगाह बन सकती है।

सत्येन्द्र रंजन के इस आलेख को पढ़ने के उपरांत किसी चीज में मन न लगा। आप खुद सोचिए ¡ क्या यह सबसे पहले हल की जाने वाली समस्या है, या नहीं? क्या यह अनियंत्रित वैश्वीकरण दुनियाँ को किसी अनजाने संकट की और तो नहीं धकेल रहा है? और क्या जिस समाज नियंत्रित अर्थव्यवस्था को मार्क्सवादी सोच कह कर तिलाँजलि दे दी गई थी उस पर तुरंत पुनर्विचार की आवश्यकता तो नहीं है, इस मानव समाज को बचाने के लिए?

आप का क्या सोचना है। "अब पहले खाने के बारे में सोचिए!" पढ़ कर बताएं।