@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: भविष्य के लिए मार्ग तलाशें

सोमवार, 18 जनवरी 2010

भविष्य के लिए मार्ग तलाशें

नवरत पर कल की पोस्ट जब इतिहास जीवित हो उठा का उद्देश्य अपने एक संस्मरण के माध्यम से आदरणीय डॉ. रांगेव राघव जैसे मसिजीवी  को उन के जन्मदिवस पर स्मरण करना और उन के साहित्यिक योगदान के महत्व को प्रदर्शित करना था। एक प्रभावी लेखक का लेखन पाठक को गहरे बहुत गहरे जा कर प्रभावित करता है। डॉ. राघव का साहित्य तो न जाने कितने दशकों या सदियों तक लोगों को प्रभावित करता रहेगा। आज उस पोस्ट को पढ़ने के उपरांत मुझे मुरैना के युवा ब्लागर और वकील साथी भुवनेश शर्मा से  फोन पर चर्चा हुई। वे बता रहे थे कि वे वरिष्ठ वकील श्री विद्याराम जी गुप्ता  के साथ काम करते हैं जिन की आयु वर्तमान में 86 वर्ष है, उन्हें वे ही नहीं, सारा मुरैना बाबूजी के नाम से संबोधित करता है। वे इस उम्र में भी वकालत के व्यवसाय में सक्रिय हैं।  आगरा में अपने अध्ययन के दौरान डॉ. रांगेय राघव के साथी रहे हैं। बाबूजी विद्याराम जी गुप्ता ने कुछ पुस्तकें लिखी हैं और प्रकाशित भी हुई हैं। लेकिन उन की स्वयं उन के पास भी एक एक प्रतियाँ ही रह गई हैं। उन्हों ने यह भी बताया कि वे उन पुस्तकों के पुनर्प्रकाशन का मानस भी रखते हैं। मैं ने उन से आग्रह किया कि किसी भी साहित्य को लंबी आयु प्रदान करने का अब हमारे पास एक साधन यह अंतर्जाल है। पुनर्प्रकाशन के लिए उन की पुस्तकों की एक बार सोफ्ट कॉपी बनानी पड़ेगी। वह किसी भी फोंट में बने लेकिन अब हमारे पास वे साधन हैं कि उन्हें यूनिकोड फोंट में परिवर्तित किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो हम उस साहित्य को अंतर्जाल पर उपलब्ध करा सकें तो वह एक लंबी आयु प्राप्त कर सकेगा। मुझे आशा है कि भुवनेश शर्मा मेरे इस आग्रह पर शीघ्र ही अमल करेंगे।


ल की पोस्ट पर एक टिप्पणी भाई अनुराग शर्मा ( स्मार्ट इंडियन) की भी थी। मेरे यह कहने पर कि विष्णु इंद्र के छोटे भाई थे और इंद्र इतने बदनाम हो गए थे कि उन के स्थान पर विष्णु को स्थापित करना पड़ा, उन्हें इतना तीव्र क्रोध उपजा कि वे अनायास ही बीच में कम्युनिस्टों और मार्क्स को ले आए। मेरा उन से निवेदन है कि किसी के भी तर्क का जवाब यह नहीं हो सकता कि 'तुम कम्युनिस्ट हो इस लिए ऐसा कहते हो'। उस का उत्तर तो तथ्य या तर्क ही हो सकते हैं। अपितु इस तरह हम एक सही व्यक्ति यदि कम्युनिस्ट न भी हो तो उसे कम्युनिज्म की ओर ढकेलते हैं। इस बात पर अपना अनुभव मैं पूर्व में कहीं लिख चुका हूँ। लेकिन वह मुझे अपनी पुरानी पोस्टों में नहीं मिल रहा है। कभी अपने अनुभव को अलग से पोस्ट में लिखूंगा। 

ल की पोस्ट पर ही आई टिप्पणियों में फिर से एक विवाद उठ खड़ा हुआ कि आर्य आक्रमण कर्ता थे या नहीं। वे बाहर से आए थे या भारत के ही मूल निवासी थे। इस विवाद पर अभी बरसों खिचड़ी पकाई जा सकती है। लेकिन क्या यह हमारे आगे बढ़ने के लिए आवश्यक शर्त है कि हम इस प्रश्न का हल होने तक जहाँ के तहाँ खड़े रहें। मेरे विचार में यह बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं है कि हम आर्यों की उत्पत्ति का स्थान खोज निकालें और वह हमारे आगे बढने की अनिवार्य शर्त भी नहीं है। लेकिन मैं समझता हूँ, और शायद आप में से अनेक लोग अपने अपने जीवन अनुभवों को टटोलें तो इस का समर्थन भी करेंगे कि वर्तमान भारतीय जीवन पर मूलतः सिंधु सभ्यता का अधिक प्रभाव है। बल्कि यूँ कहें तो अधिक सच होगा कि सिंधु सभ्यता के मूल जीवन तत्वों को हमने आज तक सुरक्षित रखा है। जब कि आर्य जीवन के तत्व हम से अलग होते चले गए। मेरी यह धारणा जो मुझे बचपन से समझाई गई थी कि हम मूलतः आर्य हैं धीरे-धीरे खंडित होती चली गई। मुझे तो लगता है कि हम मूलत सैंधव या द्राविड़ ही हैं और आज भी उसी जीवन को प्रमुखता से जी रहे हैं। आर्यों का असर अवश्य हम पर है। लेकिन वह ऊपर से ओढ़ा हुआ लगता है। यह बात हो सकता है लोगों को समझ नहीं आए या उन्हें लगे कि मैं यह किसी खास विचारधारा के अधीन हो कर यह बात कह रहा हूँ। लेकिन यह मेरी अपनी मौलिक समझ है। इस बात पर जब भी समय होगा मैं विस्तार से लिखना चाहूँगा। अभी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं कि उस में समय दे सकूँ। अभी तो न्याय व्यवस्था की अपर्याप्तता से अधिकांश वकीलों के व्यवसाय पर जो विपरीत प्रभाव हुआ है। उस से उत्पन्न संकट से मुझे भी जूझना पड़ रहा है। पिछले चार माह से कोटा में वकीलों के हड़ताल पर रहने ने इसे और गहराया है।
कोई भी मुद्दे की गंभीर बहस होती है तो उसे अधिक तथ्य परक बनाएँ और समझने-समझाने का दृष्टिकोण अपनाएँ। यह कहने से क्या होगा कि आप कम्युनिस्ट, दक्षिणपंथी, वामपंथी, राष्ट्रवादी , पोंगापंथी, नारीवादी, पुरुषवादी या और कोई वादी हैं इसलिए ऐसा कह रहे हैं, इस से सही दिशा में जा रही बहस बंद हो सकती है और लोग अपने अपने रास्ते चल पड़ सकते हैं या फिर वह गलत दिशा की ओर जा सकती है। जरूरत तो इस बात की है कि हम भविष्य के लिए मार्ग तलाशें। यदि भविष्य के रास्ते के परंपरागत नाम से एतराज हो तो उस का कोई नया नाम रख लें। यदि हम भविष्य के लिए मार्ग तलाशने के स्थान पर अपने अपने पूर्वाग्रहों (इस शब्द पर आपत्ति है कि यह पूर्वग्रह होना चाहिए, हालांकि मुझे पूर्वाग्रह ठीक जँचता है") डटे रहे और फिजूल की बहसों में समय जाया करते रहे तो भावी पीढ़ियाँ हमारा कोई अच्छा मूल्यांकन नहीं करेंगी। 

11 टिप्‍पणियां:

L.Goswami ने कहा…

"भविष्य के लिए मार्ग तलाशें" - सहमत ...पर जिन्हें हर बात पर किसी "वाद" की बू आती है(जैसे यह होना जरुरी है) उन्हें इन सब से कोई फर्क नही पड़ने वाला.

राज भाटिय़ा ने कहा…

भुवनेश शर्मा मेरे इस आग्रह पर शीघ्र ही अमल करेंगे।बहुत अच्छी बात दिनेश जी इस बारे शायद लिखने के बारे मै शायद मै आप की मदद कर सकूं, इस साहित्या को पीसी पर लिखने के लिये, शायद इस गर्मियो मै मेरे पास बहुत समय होगा.
बाकी बहस तो ठीक है लेकिन जब बहस सही ओर उसी विषय पर हो, वरना बात का बतंगड बन जाता है, आप ने लेख बहुत सुंदर लिखा है

अजित वडनेरकर ने कहा…

इस टिप्पणी को दरअसल यहां लगाना था, पर पिछली पोस्ट पर लग गई। भारी गफ़लत है आर्य-द्रविड़ मसले की तरह ही।

आधुनिक नृतत्वशास्त्रियों का ध्यान रूस के एन्द्रोनावो पर भी गया है। वैसे यह सब बहुत पेचीदा है। मानव समूह लगातार विचरते रहे हैं, जैसा कि अरविंदजी क्वचिदन्यतोअपि पर कह रहे हैं। काले भी और गोरे (आर्य) भी कहीं बाहर से नहीं आए थे बल्कि वृहत्तर भारत की सीमाओं में थे। आकाश में बनते बादलों के वलयो-वर्तुलों को देखें। एक दूसरे में समाना, नई आकृतियां बनाना और फिर अलग होकर नए गुच्छों में तब्दील होना। यह सब जन समूहों में चलता रहा है-तब भी जब सभ्यताएं जन्मीं। आज तक जारी है यह क्रम। मनुष्य का गर्वबोध समूह से जुड़ा है और तब से नस्ली श्रेष्ठता ने इन तमाम विवादों को जन्म दिया। आर्य शब्द की व्युत्पत्ति में जाएं तो वे असभ्य और जंगली कहलाते हैं। तब तक भारत भूमि पर कृषि संस्कृति पनप चुकी थी। एक नया शोध द्रविड़ों को जाति नहीं बल्कि खेतिहर कुऩबी ही मानता है। आर्य अर्थात वनवासी बंजारे भी सीमांत से होकर सदियों से इधर ही विचरते रहे थे। इनकी पहुंच तब तक सुदूर पश्चिम तक थी। कृष्णवर्णी लोग भी भूमध्यसागर तक बिखरे थे। किसी काल विशेष में वनवासी, यायावरों और खेतिहरों में संघर्ष हुआ होगा। यह बेहद सीमित क्षेत्र में रहा होगा पर इसकी चर्चा ही प्राचीन ग्रन्थों में श्रुतियों के आधार पर फूलती-फैलती चली गई। ऐसा लगता है। यह अनुमान है। इस विषय में ज्यादातर अनुमान ही प्रचलित हैं, किंचित प्रमाणों के तड़के के साथ।

यह चर्चा लगातार चलती रहेगी, मगर नतीजा निकलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हां, खोज के दौरान बहुत सी अन्य प्राप्तियां होती रहती हैं, उन्हें ही हासिल माना जाना चाहिए।

उम्मतें ने कहा…

मुझे नहीं लगता की आपकी अपील से कुछ होने वाला है !

Arvind Mishra ने कहा…

आज हम एक सम्मिश्र सभ्यता के प्रतिनिधि हैं (...और मिश्रों का योगदान उसमें सबसे अधिक है हा हा ,वैसे यह मजाक नहीं हैं ) ..हमने तमाम संस्कृतियों के अवयवों को अन्तस्थ किया है मगर आप का यह कहना सच लगता है की अपने मूल सैन्धव भाव को बनाए रखा है -मुख्य धारा वही है -मगर कालांतर के कथित आर्यों के अवदानों को भी हम विस्मृत नहीं कर सकते-उन्होंने हमारे ज्ञान को संकलित किया है -ऋग्वेद को वर्गीकृत करने ,कंठस्थ करने में उनकी महती भूमिका रही ..हाँ वे ऋग्वेद और परवर्ती वेद, उपनिषद के रचयिता नहीं हैं ,बस संकलक मात्र हैं -और तनिक सामयिक सुधारक भी .....
आर्य, सैन्धव पूजा पद्धति में लिंग पूजा के विरोधी थे .....बल्कि घृणा तक करते थे ...मगर यह सैन्धव तत्व की ही प्रधानता थी की बाद में लिंग पूजा संगठित होती गयी ....आर्य ठगे से देखते रह गए -कभी कभी लगता है की गृहीत और पराधीन होकरभी नारियों ने सैन्धव रीति रिवाजों को आगे ले जाने में महनीय भूमिका निभाई है -लिंग पूजा की पुनर्स्थापना में उनका निर्णायक योगदान लगता है .बातें बहुत है ....दिक्कत है सैन्धव लिपि ही अभी नहीं पढी जा सकी है ....अनेक चित्र प्रतीकों से ही हम उनके बारे में कुछ समझ पाते हैं .
हाँ ,अपने कुछ सुधी पाठकों से अनुरोध करें की वे कृपा कर मेरे ब्लॉग पर भी चल रही चर्चा में भी भाग लें -अकादमीय सहिष्णुता का तकाजा यही है ,काश !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

पोस्ट और टिप्पणियां दोनों मार्गदर्शन कर रही हैं,अब हम क्या सुझाएँ ,पढनें में ही आनंद है.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

ये पिछली किस पोस्ट की बात होरही है? हम नही पढ पाये, शायद हमारी फ़ीड मे नही आई वो पोस्ट, अब पिछली पोस्ट और उस पर आई टिप्पणीयां पढेंगे तभी कुछ कह पाने की स्थिति मे आ पायेंगे.

रामराम.

निर्मला कपिला ने कहा…

आपकी ये पोस्ट बहुत कुछ जानने और समझने को मिला। हाँ अगर फाँट बदलना मुझे भी बता सकें तो कृ्पा होगी मेरे पास अपनी दोनो किताबों की सी डी है उसे यूनिकोड मे बदलना चाहती हूँ मगर उस सी डी को किस फाँट मे लिखा गया है ये पता नहीं क्या बदला जा सकता है? अब मुझे हर कहानी दोबारा लिखनी पड रही है यूनिकोड मे
धन्यवाद ,शुभकामनायें

Abhishek Ojha ने कहा…

हिंदी ब्लॉग्गिंग में सार्थक बहस और विवाद में धागे भर का फर्क है ! ये लाइन आगे जिसने ओंकारा फिल्म देखी है पूरा करे :)
वैसे मुझे ये बहस बहुर रोचक लगी.

अजेय ने कहा…

अजित जी सही अनुमान लगा रहे है... ठीक भी है, जब अनुमान ही लगाने हैं तो क्यों न सकारात्मक अनुमान लगाए जाएं?

अभय तिवारी ने कहा…

हमेशा की तरह संतुलित बात!
और ये सही है कि विष्णु इन्द्र के सबसे छोटे भाई थे.. बारहवें आदित्य..मायावी विष्णु.. जिन्होने वामन रूप लिया..
आर्य-द्रविड़ का जहाँ तक प्रश्न है.. कितना किसका प्रभाव है तय करना मुश्किल है.. लेकिन इतना तय है कि आर्य रेशियल ग्रुप नहीं था.. भाषाई समूह था.. तो कितना प्रभाव है यह भाषा से तय करना होगा.. और भाषाई प्रभाव आते-जाते रहते हैं.. दो सौ साल पहले हम पर फ़ारसी प्रभाव था.. आज कल अंग्रेज़ी का प्रभाव है.. क्या कहियेगा?